एक बार फिर बैकफुट पर विपक्ष

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अर्जुन देशप्रेमी

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अच्छी खासी कमी करके विपक्ष को बैकफुट पर ढकेल दिया है. एक तरह से आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान विपक्ष से उन्होंने एक बड़ा मुद्दा छीन लिया है. 

विपक्ष महंगाई के मुद्दे को लेकर बार-बार हमलावर हो रहा था कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी से हो रही वृद्धि के कारण महंगाई तेजी से बढ़ रही है और किसानों की कमर टूट रही है क्योंकि किसान ट्रैक्टर और सिंचाई के लिए पंपिंग खेतों में डीजल का उपयोग करता है. इससे जहां किसानों की लागत बढ़ रही है, वहीं दूसरी आवश्यक चीजों की कीमतें भी बढ़ रही हैं क्योंकि डीजल की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण परिवहन लागत तेजी से बढ़ी है.

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विपक्ष इस बात को लेकर भी हमलावर हो रहा था कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि के कारण मध्यम वर्ग की कमर भी टूट रही है जो अपने स्कूटर और गाड़ियों में पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल करता है. 

विपक्ष को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि प्रधानमंत्री मोदी अपने विदेश यात्रा से आने के बाद एक झटके में डीजल की कीमत ₹10 घटा देंगे और इसके साथ ही भाजपा शासित और भाजपा के सहयोगी दलों यानी एनडीए की राज्य सरकारें अपने यहां वैट की दरों में कमी कर देंगी जिससे डीजल ₹17 तक नीचे आ जाएगा. ऐसे में विपक्ष ने ताबड़तोड़ हमले करने शुरू किए थे और पेट्रोल-डीजल को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की थी. 

पर अब जबकि नरेंद्र मोदी ने ऐसा निर्णय लिया है और एक्साइज में भारी कमी कर दी है जिससे डीजल के मूल्यों में ₹12 से लेकर ₹17 तक की कमी आ गई है, विपक्ष ने अब इस मुद्दे को छोड़ देना ही बेहतर समझा है. पिछले 2 दिनों से जिस तरह से विपक्ष की प्रतिक्रियाएं आई हैं, वह दर्शाती हैं कि विपक्ष ने इस मुद्दे को अब ना उठाने का ही निर्णय लिया है. 

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पर विपक्ष के लिए समस्या दूसरी है. आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में जहां भी विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां अब उनकी सरकारें दबाव में आ गई है कि वह भी अपने यहां बैठ की दरों में कमी करें जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें भाजपा शासित राज्यों के बराबर आ सके. अगर विपक्ष की सरकार ऐसा नहीं करती हैं तो उन्हें चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है और अगर वह ऐसा करती हैं तो भारतीय जनता पार्टी और एनडीए हमलावर होकर कहेगा कि जो आरोप विपक्षी दल उन पर लगा रहे थे कि चुनाव के मद्देनजर उन्होंने पेट्रोल और डीजल की कीमतें घटाई, तो फिर अब विपक्ष की सरकारें क्या कर रही हैं? 

ऐसे में विपक्ष की सरकारें दोनों ही तरफ से नुकसान में रहेंगी. पर जहां तक जनता की बात है अगर जनता के हितों की बात करें, तो साफ है कि पेट्रोल और डीजल की दरों में वृद्धि हुई थी जिससे आम आदमी काफी परेशान था और महंगाई भी बढ़ रही थी. केंद्र सरकार में बैठे पदाधिकारी और नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे थे. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरीके से एक झटके में पेट्रोल में ₹5 और डीजल में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की, वह एक सही फैसला है. इस कदम से जनता को राहत मिलेगी. साथ ही जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी और एनडीए की सरकारों ने अपने राज्यों में वैट दरों में कमी की है, उससे यह राहत और बेहतर हो जाएगी जिसका फायदा आम आदमी को मिलेगा.

पर दुखद बात यह है कि जनता के हितों की बात करने वाले विपक्ष की राज्य सरकारें इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही हैं. जब भारतीय जनता पार्टी और एनडीए की सरकारें राज्यों में पेट्रोल और डीजल पर वैट में कमी कर सकती हैं और जनता को राहत दे सकती हैं तो फिर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में वैट की दरें कमी कम क्यों नहीं की जा सकती? पर अब तक गैर भाजपा गैर एनडीए सरकारें ऐसा करती नहीं दिख रही है जो एक तरह से जनता के साथ अन्याय ही है. यहां एक और महत्वपूर्ण बात है कि वैट की सबसे ज्यादा दरें कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में ही है जहां 36% की दर से वैट लागू है. ऐसे में विपक्ष की राजनीति समझ में नहीं आती कि वह जनता के लिए राहत की बात करती तो है पर जब जनता को राहत देने की बात आती है तब वह अपनी अपनी राय सरकारों के माध्यम से पीछे क्यों हट जाती है.

 पहले की तुलना में अब लोग ज्यादा समझदार हो गए हैं और उन्हें पता चलने लगा है कि कौन क्या कर रहा है. ऐसे में संभव है कि केंद्र सरकार मोदी सरकार और उनकी राज्य सरकारों ने जो कदम उठाया है जिससे पेट्रोल और डीजल के दाम तेजी से नीचे आए हैं, वह विपक्ष पर भारी पड़ जाए.

 इसका दूसरा पहलू यह है कि एक्साइज ड्यूटी में कमी के कारण राजस्व में जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई हाल में आ रही आर्थिक गतिविधियों में तेजी और आर्थिक विकास दर में वृद्धि के कारण हो जाए. यहां उल्लेखनीय है कि सरकार को जीएसटी के माध्यम से अब तक के सबसे ज्यादा 1,30,000 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ है जो बहुत बड़ी राशि है. ऐसे में केंद्र सरकार अपने घाटे को काफी हद तक संतुलित रखने में सफल होगी. जो लोग यह आकलन कर रहे हैं कि इससे केंद्र का बजट संतुलन बिगड़ जाएगा, वह कुछ हद तक सही कह रहे हैं पर यह एक मात्र सत्य नहीं है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

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