गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र: जहां से चार-चार बार सांसद बने हैं राव इंद्रजीत व उनके पिता राव बिरेन्द्र सिंह

गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र: जहां से चार-चार बार सांसद बने हैं राव इंद्रजीत व उनके पिता राव बिरेन्द्र सिंह
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अनिल आर्य 

ज जिस क्षेत्र को हम गुड़गांव लोकसभा के नाम से जानते हैं वो 2009 में अस्त्तिव में आया था। गुड़गांव लोकसभा के नाम से 1952 से 1971 तक लोकसभा क्षेत्र था लेकिन उसके बाद गुड़गांव को भंग कर उसे महेंद्रगढ़ व फरीदाबाद क्षेत्र में शामिल कर दिया गया। 1977 में पहली बार फरीदाबाद अस्तित्व में आया। 

माने 1977 से 2009 तक गुड़गांव नहीं रहा। यह जिला महेंद्रगढ़ लोकसभा क्षेत्र में शामिल था। नई परिसीमन के बाद महेंद्रगढ़ को भंग कर उसे भिवानी-महेंद्रगढ़ और गुड़गांव में बांट दिया गया। महेंद्रगढ़ के 6 विधानसभा इलाके गुड़गांव में शामिल किए गए। जबकि फरीदाबाद लोकसभा क्षेत्र से मेवात के हथीन क्षेत्र को छोड़कर बाकी पूरा इलाका गुड़गांव में शामिल किया गया। 

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महेंद्रगढ़ लोकसभा क्षेत्र 1952 से था। यहां से पहले सांसद हीरासिंह चिनारिया बने थे। वो कांग्रेस से थे। उसी साल रामकृष्ण गुप्ता कांग्रेस से ही बने। 1957 में भी गुप्ता ही चुने गए। 1962 में युद्धवीर सिंह जनसंघ से चुने गए। तब तक यह क्षेत्र सयुंक्त पंजाब में आता था। 1967 में हरियाणा के गठन के बाद राव गजराज सिंह कांग्रेस से संसद पहुंचे।

अहीर बाहुल्य होने की वजह से यह क्षेत्र अहीरवाल के नाम से जाना जाता रहा है और राव बिरेन्द्र सिंह को अहीरवाल का undisputed राजा माना जाता रहा है। आज भी उनके पुत्र राव इंद्रजीत को इस इलाके का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। राव बिरेन्द्र ने 1971 में अपनी पार्टी विशाल हरियाणा पार्टी से चुनाव लड़ा और सांसद बने। इसी पार्टी के मुखिया के नाते वो हरियाणा के सीएम भी रहे थे। जबकि गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र से 1952 में कांग्रेस के पंडित ठाकुर दास भार्गव, 1957 में कांग्रेस के ही मौलाना अबुल कलाम आजाद सांसद चुने गए थे। 1957 में प्रकाश वीर शास्त्री स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर लड़े और जीते। 1962 में राव गजराज ने कांग्रेस की टिकट पर जीत दर्ज की जबकि 1967 में अब्दुल गनी डार ने आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता। 1971 में मेवात के दिग्गज नेता चौ तैयब हुसैन ने जीत दर्ज की।

 नई परिसीमन के बाद गुड़गांव लोकसभा खत्म हो गई और महेंद्रगढ़ के नाम से नया चुनाव क्षेत्र बन गया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी की लहर में उन्हें मनोहर लाल सैनी ने पटखनी दे दी। पर 1980 और 1984 में राव बिरेन्द्र सिंह फिर से कांग्रेस की टिकट पर लड़े और जीते। 1989 में उन्होंने जनता दल का दामन था और सांसद बने। तब तक रामपुरा हाउस यानी राव बिरेन्द्र का इस इलाके में लगभग एकछत्र राज रहा, मगर फिर उन्हीं के निकट सम्बंधी कर्नल रामसिंह ने उन्हें जोरदार चुनौती दी। कहा जाता है कि कर्नल के मैदान में आने से पहले तक राव बिरेन्द्र सिंह को कभी भी गांव गांव जाकर वोट नहीं मांगनी पड़ी। लेकिन कर्नल ने उनकी सत्ता को सफल टक्कर दी और 1991 में कांग्रेस की टिकट पर पहली मर्तबा चुनाव जीतकर सारे समीकरणों और किस्से कहानियों को बदलकर रख दिया। 1996 तक आते आते कांग्रेस और कर्नल दोनों का मन एक दूसरे आए भर गया था। कर्नल ने भाजपा का दामन थामा और चुने गए, लेकिन 1998 में राव बिरेन्द्र सिंह के पुत्र ने अपने पिता की विरासत संभाली और कर्नल को चित्त कर कांग्रेस की टिकट से लोकसभा में पहुंच गए।

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एक साल के भीतर ही फिर चुनाव हुए। 1999 का यह चुनाव कारगिल युद्ध की जीत की लहर पर था। भाजपा ने युद्ध में शहीद हुए कमान्डेंट सुखबीर सिंह की पढ़ी लिखी पर राजनीति में कोरी पत्नी डॉ सुधा यादव को टिकट दी और वो इंद्रजीत को हराकर संसद में पहुंच गईं। लेकिन वो अहीरवाल की सियासत में राव इंद्रजीत के लिए बड़ा खतरा नहीं बन पाई और 2004 में कांग्रेस के राव इंद्रजीत ने उन्हें हरा दिया। 

अगला चुनाव 2009 में हुआ। यह परिसीमन के बाद पहला चुनाव था। लोकसभा क्षेत्र भी बदले और विधानसभा क्षेत्र भी। गुड़गांव के नाम से नया लोकसभा क्षेत्र बना। राव इंद्रजीत कांग्रेस की टिकट से लड़े और जीते। 2014 में राव ने पाला बदला और भाजपा में शामिल होकर चुनाव जीता।

2019 में कौन जीतेगा, मई के अंत तक पता चल जाएगा पर संकेत यही हैं कि इस बार भी भाजपा राव इंद्रजीत पर ही भरोसा करेगी जबकि कांग्रेस की टिकट के लिए राव दानसिंह, कैप्टन अजय यादव, आफताब हुसैन के साथ साथ इनेलो के एक मौजूदा विधायक का नाम चर्चा में है। राजकुमार सैनी की लोसुपा, इनेलो, जेजेपी और आम आदमी पार्टी भी मैदान में ताल ठोकेंगी। लोसुपा ने सतीश यादव को घोषित किया हुआ है, बाकी के कौन होंगे पता चलेगा।

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