तालिबान: भारत क्यों चूक रहा है?: डॉ. वैदिक

तालिबान: भारत क्यों चूक रहा है?: डॉ. वैदिक
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक 

फगानिस्तान पर आजकल रुस, चीन और पाकिस्तान का संयुक्त मोर्चा बन रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि ईरान भी इसमें शामिल हो जाए लेकिन इसमें आश्चर्य की बात यह है कि इस मोर्चे में न कहीं अफगानिस्तान है और न भारत है। अमेरिका भी उसके बाहर ही है।

तीन राष्ट्र अंदर और तीन राष्ट्र बाहर ! ये कौनसा मोर्चा है? यह मोर्चा बन रहा है, अफगानिस्तान के तालिबान को साधने के लिए। अफगान तालिबान का सफाया करने के लिए किस-किस देश ने कितना-कितना जोर लगाया, यह बताने की जरुरत नहीं है लेकिन वे अभी भी दनदना रहे हैं।

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वे कभी काबुल में विस्फोट करते हैं तो कभी कंधार में ! वे कभी किसी पूरे जिले पर काबिज हो जाते हैं तो कभी किसी शहर पर ! पहले माना जाता था कि तालिबान उन्हीं इलाकों में असरदार हैं, जिनमें ज्यादातर पठान लोग रहते हैं याने दक्षिण और पूर्व के इलाके लेकिन अब तो तालिबान की पकड़ उत्तर के हेरात और कुंदुज-जैसे शहरों में भी हो गई है।

इन शहरों में अक्सर ताजिक, उजबेक और अन्य जातियों की बहुसंख्या होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि तालिबान के प्रभाव का फैलाव अब सारे अफगानिस्तान में हो रहा है। यह इसलिए और भी चिंता की बात है कि अफगानिस्तान से विदेशी फौजें बिदा हो चुकी हैं।

सिर्फ साढ़े नौ हजार अमेरिकी सैनिक अभी वहां बचे हैं। अफगान फौज में कितने सैनिक तालिबान-समर्थक हैं, कुछ पता नहीं। ऐसे में सभी राष्ट्रों को मिलकर तालिबान-समस्या का हल करना चाहिए लेकिन पाकिस्तान की कूटनीति सफल होती दिख रही है। वह चाहता है कि अफगान-सरकार में तालिबान भी शामिल हो जाएं और बाद में वे उसके इशारों पर काम भी करें।

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रुस चाहता है कि सीरिया के ‘इस्लामी राज्य’ के छापामारों के साथ तालिबान हाथ न मिलाएं और चीन इस मामले में इन दोनों देशों का साथ दे रहा है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधानमंत्री डाॅ. अब्दुल्ला में पहले दिन से ही तलवारें खिंची रहीं हैं। वे एक-दूसरे से तालमेल नहीं बिठा पा रहे तो वे तालिबान से कैसे बिठाएंगे? ऐसे में भारत अलग-थलग पड़ रहा है।

यह ठीक नहीं है। भारत को तालिबान से भी सीधा संपर्क करना चाहिए। सभी तालिबान भारत-विरोधी नहीं हैं। तालिबान के उच्चतम नेताओं और मंत्रियों से मेरा सतत संपर्क रहा है। हमारे जहाज का जब अपहरण हुआ था, उस समय कंधार में उन्होंने हमारी मदद की थी। यदि भारत इस मौके पर चूक गया और यह नया मोर्चा सफल हो गया तो लंबे समय तक भारतीय विदेश नीति को पछताना पड़ेगा। 

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