झंडा गीत के रचयिता-श्याम लाल गुप्त

झंडा गीत के रचयिता-श्याम लाल गुप्त
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09 सितंबर । श्याम लाल गुप्त पार्षद जी का जन्म 9 सितंबर 1816 को कानपुर जनपद के नर्वल गांव में दोसर वैश्य परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम कौशल्या देवी तथा पिता का नाम विंदेश्वर प्रसाद गुप्त था। उनका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। किसी प्रकार उन्होंने पढ़ाई पूरी की। वैश्य परिवार के होने के बावजूद व्यापार की ओर उनकी रुचि नहीं थी। एक के बाद दो विद्यालयों में अध्यापक नियुक्त हुए, पर दोनों स्थानों से त्यागपत्र दे दिया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारतीयों का संघर्ष आरंभ हो चुका था। युवा वर्ग इस ओर आकर्षित हो रहा था। पार्षद जी ने भी राजनीति में प्रवेश किया। सर्वप्रथम वे गणेश शंकर विद्यार्थी जी के संपर्क में आए और उनके साथ कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में सम्मिलित हुए। वहां उन्हें फतेहपुर में कांग्रेस का कार्य सौंपा गया।

वर्ष 1921 में पार्षद जी ने शपथ ली कि जब तक देश स्वतंत्र नहीं हो जाएगा, नंगे पांव चलूंगा, धूप तथा वर्षा में छाता नहीं लगाउंगा तथा कंधे पर अंगोछा नहीं रखूंगा। अंतिम समय तक उन्होंने अपनी शपथ का पालन किया।

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इसके बाद 21 अगस्त 1921 को पहली बार पार्षद जी रानी असोधर के महल से गिरफ्तार हुए। 1924 में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध व्यंग्य लिखने के कारण उन पर पांच सौ रुपए जुर्माना हुआ। 1930 में फिर जेल भेजे गए, रिहाई के पश्चात 1932 से अंडरग्राउंड रहकर कार्य शुरू रखा।

1924 में स्वतंत्रता संग्राम में गति आई। पार्षद जी ने झंडा गीत लिखा। इस गीत के द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों में उत्साह जगा। चारों ओर यह गीत गूंजने लगा। यहां तक कि 1934 के हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन में झंडा गीत को राष्ट्रगीत बनाने की घोषणा की गई। 1944 में पार्षद जी पुन: गिरफ्तार हुए। इसके बाद 1947 में देश स्वतंत्र हुआ। झंडा गीत जन-जन की जबान पर रहने लगा।

स्वतंत्रता के बाद भी देश के विकास में पार्षद जी योगदान देते रहे। वे एक सच्चे देशभक्त थे। वे रामकथा के मर्मज्ञ थे। 1954 में प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद जी ने राष्ट्रपति भवन में उनसे राम कथा सुनी थी। 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश की सेवा करने के लिए उन्हें सम्मानित किया। सन 1973 में पार्षद जी पद्म भूषण से अलंकृत किए गए। पार्षद जी सदैव नंगे पांव चलते थे। एक बार कांच चुभ जाने से घायल हुए और इसी कारण 10 अगस्त 1977 को उनका निधन हो गया।

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जिस झंडा गीत के कारण पार्षद जी का उल्लेख भारतीय इतिहास में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में किया जाएगा वह निम्नलिखित है

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसाने वाला,
प्रेम सुधा बरसाने वाला।
झंडा ऊंचा रहे हमारा।।
आओ प्यारे वीरो आओ,
अपने देश पर बलि-बलि जाओ।
एक साथ सब मिलकर गाओ,
भारत प्यारा देश हमारा।
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
इसकी शान न जाने पाए,
चाहे जान भले ही जाए।
विश्व विजय करके दिखलाएं,
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।।
झंडा ऊंचा रहे हमारा।।   
संजय कुमार चतुर्वेदी

 

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