कश्मीरः बात बननी मुश्किल

कश्मीरः बात बननी मुश्किल
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

गृहमंत्री राजनाथसिंह की इस घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए कि अब कश्मीर पर बातचीत का दरवाजा सबके लिए खुला रहेगा। यह बातचीत करेंगे, खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा। शर्मा को यह छूट दी गई है कि वे जिससे चाहें, बात करें। 

शर्मा को इस नाजुक संवाद के लिए चुनना पड़ा है, इसका अर्थ क्या है? क्या यह नहीं कि भाजपा के पास कोई ऐसा भरोसेमंद और बुद्धिमान नेता नहीं है, जो कश्मीरियों से बात कर सके। क्या भाजपा के नेताओं को यह भी पता नहीं है कि देश में ऐसे कौन-कौन से प्रमुख सार्वजनिक लोग हैं, जिनसे हर तरह के कश्मीरी बात करना पसंद करेंगे ? इस राजनीतिक अपरिपक्वता के बावजूद इस पहल का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए कि अब कश्मीर के अलगाववादियों और उग्रवादियों से भी सीधी बातचीत हो सकेगी लेकिन मेरी राय यह है कि जब तक पाकिस्तान की फौज और नेताओं से भी सीधी बात नहीं होगी, तब तक कश्मीर समस्या का हल निकलनेवाला नहीं है। 

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यह सरकार बिजली के बल्ब पर फूंक मारकर उसे बुझाना चाह रही है। उसे उसके इस्लामाबाद के खटकों को दबाने पर भी ध्यान देना चाहिए। खुफिया विभाग के किसी भी पूर्व या वर्तमान प्रमुख के प्रति कश्मीरियों का सदभाव कैसे हो सकता है, यह मेरी समझ के बाहर है। स्वयं राजनाथसिंह बातचीत के लिए कश्मीर गए थे। वह अच्छी पहल थी। 

 

अब भी सर्वज्ञजी यदि घबराएं नहीं तो आडवाणीजी, जोशीजी, शांताकुमारजी, डाॅ. अरुण शौरी, यशवंत सिंहा आदि तो हैं ही ,अनेक गैर-भाजपाई नेता और विद्वान भी उपलब्ध हैं, जिनके व्यक्तित्व और बातचीत दोनों में विश्वसनीयता कहीं ज्यादा रहेगी। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी इस तरह के लोगों से सक्रिय सहयोग करने में ज्यादा रुचि दिखाएगी। 

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सर्वज्ञजी को यह पता है कि नहीं, कि प्रधानमंत्री नरसिंहराव और प्र.मं. अटलबिहारी वाजपेयी भी हुर्रियत नेताओं से सीधे संपर्क में थे ? नेता लोग अपना काम अफसरों के मत्थे मढ़कर बरी नहीं हो सकते। यह ठीक है कि भाजपा के नेतागण आजकल बहुत मसीबत में फंस गए हैं लेकिन देश-सेवा के लिए उनके साथ कोई भी सहयोग करने को तैयार होगा।

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