सावधान! 'फिर आ गया बाढ़ का मौसम'

सावधान! 'फिर आ गया बाढ़ का मौसम'
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शरद गोयल

विधि की यह कैसी विडंबना है कि आज देश को आजाद हुए लगभग 70 साल हो गए और देश का पहला बजट 171.15 करोड़ रुपये का था और आज का बजट 21 लाख करोड़ का हो गया। फिर भी वर्ष के अप्रैल मई जून में देश का बहुत बड़ा हिस्सा सूखे के कारण भयभीत रहता है तो जुलाई अगस्त सितंबर बाढग़्रस्त होने की पीड़ा झेलता है।

यह सिलसिला है कि पहले बाढ़ की चपेट में देश का निर्धारित भाग ही आता था। आज स्थिति यह है कि जबसे जलवायु परिवर्तन से समस्त पृथ्वी भूजल प्रभावित हुआ है, भारत में किसी भी स्थान पर बाढ़ और सूखा संभव है। एक अनुमान के अनुसार इससे प्रतिवर्ष लगभग 25 हजार करोड़ का राष्ट्रीय नुकसान होता है और हजारों लोगों की जान जाती है। केंद्र सरकारें भिन्न-भिन्न योजनाओं के माध्यम से जल प्रबंधन का दावा करती रही हैं लेकिन बाढ़ की स्थिति में कोई भी सुधार नहीं हुआ है।

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यदि मैं कहूं कि बाढ़ भी राजनीतिक भ्रष्टाचार का माध्यम बन गया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बाढ़ के नुकसान में मुआवजे व अन्य राशि में खर्च किया गया धन ग्राम पंचायत से लेकर केंद्र सरकार के स्तर तक अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। मेरा मानना है कि इसी कारण बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं हो रहा अन्यथा विश्व में अनेक देशों जैसे चीन, अमेरिका आदि ने अपने देशों की भूमि को लगभग बाढ़मुक्त बना दिया है। सामान्य परिस्थितियों में इन देशों में बाढ़ नहीं आती है। क्या कारण है कि एक तरफ  देश का बहुत बड़ा हिस्सा गिरते हुए जलस्तर से त्रस्त है और दूसरी तरफ  जलभराव व बाढ़ से हर साल विनाश का तांडव होता है।

भारत में बाढ़ सामान्यत: मानसूनी वर्षा के कारण नदियों में अति जल के बहाव के कारण आती है। मैं यहां यह भी बताऊं कि इनमें विशेष रूप से उत्तर-पूर्व भारत में यह बाढ़ विदेशों से बहकर आने वाली नदियों के कारण है। उत्तरी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पूर्वी बंगाल देश में बाढग़्रस्त क्षेत्र चिन्हित किया गया है और यहां प्रमुख नदियां जो कि बाढ़ का कारण हैं, नेपाल से निकलती हैं। आवश्यकता है कि नेपाल से इन नदियों के जल के बारे में भारत सरकार एक सकारात्मक सौदा करे। इसी प्रकार चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि सभी देशों से नदी के जल बंटवारे को लेकर इस समस्या का समाधान बाहरी मुद्दों के साथ तो कम से कम समाप्त हो।

इसी प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री की सरकार की एक राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण बनाने की एक स्वर्णिम योजना थी और वर्तमान मोदी सरकार के चुनाव एजेंडे में भी इस प्राधिकरण को प्राथमिकता दी गई थी। लेकिन राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की तर्ज पर देश के विकास में मील का पत्थर साबित होगा। पता नहीं, क्यों सरकार इसको मुख्य प्राथमिकता में नहीं रखती है। एक ओर जहां सतलुज के जल बंटवारे पर राज्य में तनातनी हो रही है और कावेरी के जल बंटवारे को लेकर दो राज्यों में तलवारें खिंची हुई हैं, उसी देश का लगभग आधा भाग बाढ़ की चपेट में हर वर्ष आ जाता है और इन राज्यों का यह विवाद लगभग पिछले 30-30 साल से चला आ रहा है। जिसका कारण राजनीति की इच्छाशक्ति में कमी है।

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सरकारों की संवेदनशीलता व अवसंरचना (विकास के मूल साधन) की कलई तो इस बात से खुल जाती है कि उत्तराखंड की बाढ़ तो छोड़ो, देश की राजधानी दिल्ली यमुना में बाढ़ का खतरा इस बार भी बरकरार है। राजधानी से निकलने वाली 21 किमी लंबी यमुना नदी का विकास हम इस प्रकार नहीं कर पाए कि वह कितनी भी अधिक मात्रा में पानी आने से दिल्ली के नागरिकों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए निकल जाए। मानव के भौगोलिक सुखों को जुटाने के लिए हथिनी कुंड व टिहरी डैम जैसी परियोजनाओं का निर्माण किया गया, किन्तु मानव के मूल अस्तित्व के संकट की सुरक्षा की अनदेखी हो गई। वास्तव में आज देश के कर्णधारों को विकास के स्रोत पर पुनर्विचार की आवश्यकता है, क्योंकि विकास की योजना का आधार मनुष्य के लिए विकास है, न कि विकास के लिए मनुष्य।

हालांकि सरकार ने इस ओर एक बहुत ही अच्छा कदम उठाया कि पिछले बजट में लगभग 5 लाख कृत्रिम तालाब बनाने की घोषणा की और उसके लिए की गई खर्च की राशि का भी उल्लेख किया गया था। सरकार को यह सुनिश्चित करना है कि इन तालाबों के निर्माण से देश में बरसात के पानी को संचित करने की कितनी क्षमता बढ़ी है और इन सभी तालाबों के रखरखाव की जिम्मेदारी किस पर है। पिछले वर्षों में सेंट्रल वाटर कन्ट्रोल बोर्ड ने सरकार को एक सिफारिश की थी कि यदि देश में 450 बिलियन क्यूबिक मीटर जल संचय की क्षमता पैदा कर दी जाए तो आज के जल अभाव के संकट से मुक्ति मिल सकती है। जो कि अभी जल संचय की क्षमता 225 बिलियन क्यूबिक मीटर है। इसके अतिरिक्त जल संचय क्षमता नदियों की सफाई करके बढ़ाई जानी चाहिए। हमारी जानकारी है कि गत 150 वर्षों से भारत में नदियों की तलहटी की गाद को कभी निकाला ही नहीं गया। परिणामस्वरूप इनके जल संचय की क्षमता लगभग समाप्त सी हो गई है। विश्व के हर उन्नत देश नदियों की तलहटी से गाद निकाल कर उसकी समय- समय पर सफाई करते रहते हैं, जिससे उनकी जल-संचय की क्षमता बरकरार रहती है।

बाढ़ के संकट से निपटने के लिए एक उपाय नदियों को परस्पर जोडऩे का भी है, जिस पर गत 40 वर्षों से सरकार द्वारा विचार तो किया जा रहा है, किन्तु अमल में लाने की अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है। जरूरत है कि सरकार इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर इसे अमल में लाए। इससे बाढग़्रस्त क्षेत्रों का पानी अभावग्रस्त क्षेत्रों के अभाव दूर करने में समर्थ होगा और साथ ही बाढ़ के नकारात्मक असर को भी समाप्त करेगा। इसका जीता जागता उदाहरण राजस्थान है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने मानो पूरे राजस्थान को एक नई जिंदगी दी है और प्रदेश का एक बहुत बड़ा भाग उपजाऊ भूमि का लाभ उठा रहा है। 

राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण के बाद किसी भी राज्य का उस राज्य से गुजरने वाली नदी पर स्वामित्व व नियंत्रण नहीं रहेगा। वैसे भी जल राष्ट्रीय सम्पत्ति है, न कि किसी राज्य विशेष की है। एक प्रभावी राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण का जल्द से जल्द गठन बाढ़मुक्त भारत की आवश्यकता है।

 

(लेखक नेचर इंटरनेशनल के अध्यक्ष हैं)

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